Wednesday, 20 April 2016

वायदा

जानता हूँ क़ि
अब चाहे जैसा भी हो जाऊं,
परखोगे मुझे तुम सदा
मेरी उस एक गलती से,

मेरे हर कहे और किये को
तोलोगे , उस एक वाकये से तुम,
पाल चुके हो एक पूर्वाग्रह ,
अब मेरे लिए निष्पक्ष नहीं हो तुम

मैं अब बुरा करू या अच्छा ,
हर बार तुम्हे याद रहेगा ,
बस मेरा वह अपराध ,
क्योंकि मेरा निर्णय तुम कर चुके हो

मगर तुमसे एक वादा हे मेरा ,
कल गर तुमसे होगा कुछ गलत ,
तब मैं सिर्फ उसके बलबूते नहीं तोलूँगा तुम्हे ,
क्योंकि जानता हूँ ,
होता हे कितना भयानक ,
किसी की नजर में सदा को निर्णित हो जाना ।

Tuesday, 29 December 2015

तमाशा का साहित्य

तमाशा : बड़ी अलग सी मगर मानो साहित्यिक किताब जैसी फ़िल्म हे । ताज्जुब होता हे कि घोर व्यावसायिकता वाले माहौल में कोई हे जो लीड एक्टर्स के साथ पैरलल सिनेमा में नए प्रयोग कर रहा हे । इम्तियाज़ को सल्यूट हे उनके साहस के लिए ।
    वास्तव में ये साहस वही साहस हे जो किरदार वेद अंत में प्राप्त करता हे । कई बार लगता हे इम्तियाज़ खुद का भोगा हुआ यथार्थ दिखाते हे और इसी वजह से उनकी फिल्में साहित्यिक गहराई वाली प्रतीत होती हे ।
     ये फ़िल्म मिक्स रिव्यु लेके आई थी ।।कुछ को बहुत अच्छी तो कुछ को बेहद ख़राब लगी । फ़िल्म देखकर ये समझ भी आ गया क़ि ऐसा क्यूं रहा । वे लोग जो खुद दो ज़िन्दगी जी रहे हे और जिनके सपने आम लोगो से अलग रहे होंगे उन्हें जरूर ये अपनी कहानी लगी होगी , वेद का वह चिड़चिड़ापन उन्हें खुद का चिडचिडापन लगा होगा ।
  फ़िल्म के नजरिये से इस फ़िल्म पर कुछ कहना बेकार लगता हे क्योंकि ये आम फ़िल्म हे ही नहीं ये तो वह कहानी हे जो उस दर्शन की व्याख्या करती हे जिसमे अक्सर ही हम अपने बचपन को मारकर खुद को लगातार बड़े हो जाने का अहसास कराते हे और इस सब में हम खुद से कही दूर बहुत दूर निकल जाते हे । और एक दिन हम वह रहते ही नहीं जो क़ि हमें होना चाहिए था ।
   ये समस्या वैसे हर किसी के साथ हे ,बस अंतर कम या ज्यादा का हे ।।और इसी कारन ये फ़िल्म भी कम या ज्यादा अच्छी लगती हे ।।
  मगर इम्तियाज़ तुम वाकई इस बाजार की दुनिया में सच्ची संवेदना से भरे कलाकार हो जो खुद को लगातार ख़ोज रहा हे ।।।।

Saturday, 28 November 2015

कटाक्ष :कालिदास तुम्हारी हत्या जरुरी थी

कटाक्ष :कालिदास तुम्हारी हत्या जरुरी थी 

आज के समय में जब हर जगह सहिष्णुता और असहिष्णुता की एक बहस सी छिड़ी हे तब मुझे लगता हे कि इसका जबाब इतिहास में ढूँढना बहुत जरुरी हे .. सबसे बड़ा सवाल तो ये हे कि आज के लेखकों और बुद्धिजीवियों में इतनी हिम्मत ही कहाँ से आ गयी हे कि वो बिना सोचे समझे हमारी संस्कृति और धर्म का उपहास उड़ा देते हे ...कलबुर्गी जैसे नास्तिकों और पेरूमल मुरगन जैसे लोगों को कम से कम इतनी समझ तो होनी ही चाहिए कि ये भारत हे जहाँ संस्कृति पर सवाल नहीं झेला जायेगा ...मगर तब भी इतनी हिमाकत ? आखिर क्यूँ और कैसे ?

बहुत सोचा तब एक ही जबाब आया कि शायद प्राचीन लोग हद से ज्यादा सहनशील थे , कुछ ज्यादा ही ...वरना कालिदास आखिर जिंदा कैसे रह गए ? जिस कालिदास ने 'कुमार संभव' जैसा बेहद अश्लील साहित्य लिखा और वह भी भगवान् शिव को विषय बनाते हुए ,उस कालिदास को उस समय के लोगो ने न तो जान से मारा और उल्टा उसे महानता के शिखर पर बैठा दिया ...हालाँकि सुना हे  इसके लिए उनकी तब भी  आलोचना कि गयी थी मगर तब भी मात्र आलोचना से क्या होता ...उल्टा उन्हें उनकी अन्य रचनाओ के कारन महान लेखक साबित कर दिया गया ...कमाल तो ये हे कि ये बेहद अश्लील साहित्य कई यूनिवर्सिटी में पोस्ट ग्रेजुएशन में पढाया भी जाता हे ...मेरे हिसाब से आज के समय में इन नए लेखकों को देश में असहिष्णुता बढाने  से रोकने के लिए कालिदास तुम्हरी हत्या जरुरी थी ...

उस समय कि पीढ़ी की इस सहनशीलता ने आज के दौर में सहनशीलता के रक्षकों के सामने बड़े ही असहनशील प्रश्न खड़े कर दिए हे ...बे बेचारे जितना इन लेखकों को रोक रहे हे उतना ही कालिदास जैसे लेखको  की  घोषित महानता इनको प्रेरित करती हे कि वह हमारी पवित्र संस्कृति पर सवाल उठाये ...काश कि तुम्हे तब मार दिया होता तो ये सब आज इतने मुखर न हो पाते ..काश कि तुम आज ये सब लिखते तो तुम कालिदास नहीं कलबुर्गी बना दिए जाते ...सच में कालिदास तुम्हारी हत्या जरुरी थी ...

Sunday, 22 November 2015

कविता :चोट

कविता : चोट 


अधिक नहीं बस याद यही ,
कुछ हे कचोटता मुझे ,
क्या हे ये भी शायद जानता ,
मगर बताना भी बस ,
बढ़ाना होगा उस कचोट को ,
या शायद बह जाना होगा उसका .....


मगर सच हे कि ,
इस घोर असमंजस में ,
मैं खुद को तडपाना ,
सजा देना चाहता हू ...

कि शायद किसी तरह मेरी वह कचोट ,
मेरे मन पर बना दे ,
एक ऐसा निशां चोट का ,
कि याद रहे मुझे सदा ,
क्या था जो था कचोटता ,
क्यों था जो था कचोटता ....

नहीं मैं कोई  दार्शनिक नहीं ,
हु तो बस साधारण इंसान ,
जिसने भी की हे कई गलतियाँ,
सबकी तरह ,
जी रहा जैसे कुछ किया ही नहीं ....

इन गलतियों और चोटों का हिसाब नहीं रखा मैंने ,
मगर जब भी दी किसी और को चोट मैंने ,
तब बना लिया दिल पर खुद के
एक गहरा निशान चोट का ....

Saturday, 17 October 2015

कविता: जिज्ञासा

 जीवन में होने वाली गलतियों , उनसे उत्पन्न टूटन और उसकी सहज स्वीकारोक्ति को समर्पित कविता ....


चटकन के पड़े निशां,
छितराया मन का फलक
एक टूटन बिखरी पड़ी ,
अन्दर बहुत गहरे तलक ...

समझ सका जो न खुद को ,
खोज अर्थ भी न पाया  ,
मन के अन्दर जो झाँका ,
कुछ रौशनी कुछ अँधेरा पाया ...

उस अंधियारे रस्ते पर ,
चलने को बड़े कदम मेरे ,
वो पतन नहीं था मेरा ,
बस जिज्ञासा के थे घेरे ...

उस  जिज्ञासा के पूरन में ,
कुछ कलंक मेरे आये माथे ,
कुछ लगे दोष नए ,
कुछ मेरे असल थे साये ...

सही गलत को क्या चुनना ,
जब जिज्ञासा खुद हो रस्ता,
सही तो हे बस वही ,
जो हे पूर्व से ही स्थापित ,
जिज्ञासा के शमन में ,
सदा कलंक हे बसता ....

उस टूटन
उस चटकन ने ,
बहुत दूर मुझे ले आया हे
भटकाव मेरा कम हुआ या ज्यादा ,
कुछ समझ नहीं मन  पाया हे ....

बस हे तो एक जिज्ञासा ,
जिज्ञासाओं के सच को जानने की,
खुद के भटकाव को ,
नए सिरे तक ले जाने की ,
क्यूंकि ये भटकाव मेरा सच हे ,
ये जिज्ञासा मेरा जीवन हक़ हे ...

मैं बहूँगा समय कि धार  में पुनः ,
एक नयी जिज्ञासा फिर आएगी ,
टूटन का नया दौर चलेगा ,
जो पुनः गहरे तक बिखर जाएगी ....

Sunday, 12 July 2015

कहानी : समानता

मैं तुम पर अपनी इच्छाये नहीं थोपना चाहता मगर मैं ये भी नहीं चाहता कि तुम अब उस जगह काम करो "

"मगर मैं वहां काम करके बहुत खुश हूँ और वहां मेरी तरक्की के अवसर भी बहुत हे "

"वो ठीक हे मगर अब देखो तुम ये कॉर्पोरेट की जॉब छोड़ के किसी स्कूल में टीचर बन जाओ , उससे घर के लिए टाइम भी दे पाओगी "

"लेकिन टीचिंग ....."

"देखो मैं बस कह रहा हूँ ..."

"मगर मुझे मेरा काम बहुत पसंद हे ...."

"अरे काम तो सारे ही अच्छे होते हे , फिर औरतों के लिए तो टीचिंग बहुत ही अच्छा आप्शन हेना ..."

"होगा शायद ...मगर मुझे अपनी मार्केटिंग की जॉब में ही चेलेंज महसूस होता हे "

"यार क्या अब तुम मेरी इतनी भी नहीं मान सकती हो ..."

वो चुप थी अब ...सोच रही थी कि क्या इसे ही न थोपना कहते हे ....हाँ वो वाकई थोप नहीं रहा था बस घुमा फिरा के अपनी बात मनवाना चाहता था , या फिर इसे ही तो थोपना कहते हे ...

Wednesday, 8 July 2015

कुछ हो तुम

दर्द हो सीने में
गर छुपाना आये तो कुछ हो तुम,
आशू हो आँखों में,
गर उन्हें पीना जानो तो कुछ हो तुम....
यू रोना जो रोओगे
तो साथ तक छोड़ देगा जहाँ
जो पीठ में हो खंजर
गर तब भी मुश्काओ तो कुछ हो तुम
सच बस इतना हे
सलाम जीने वालों को करते हे लोग
सांस न भी हो हलक में
गर तब भी हो बुदबुदाहट तो कुछ हो तुम ...