Sunday, 20 November 2016

कृष्णा-अर्जुन संवाद : 4

कृष्णा-अर्जुन संवाद : 4
अर्जुन : प्रभु एक लड़के और लड़की की दोस्ती और प्रेम में क्या अंतर हेै ? न जाने क्यों मुझे तो लगता है क़ि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलूँ है क्योंकि दोस्ती कई बार प्रेम में बदल जाती है तो वहीँ प्रेम बिना दोस्ती संभव ही नहीं लगता ?
कृष्णा : प्रश्न बहुत हद तक स्वयं उत्तर समेटता है पार्थ किन्तु फिर भी एक बहुत बड़ा अंतर है ।
अर्जुन: वह क्या प्रभु ?
कृष्णा : जब तक सिर्फ दोस्ती रहती है तब तक आप हर बात को आसानी से कह सुन लेते हो , वही जब वो प्यार में बदल जाती है तो कुछ बातें आप कभी भी आसानी से नहीं कह सकते ।
अर्जुन : ये तो बड़ा उल्टा सा लग रहा है प्रभु सुनने में ?
कृष्णा : किन्तु पार्थ ,अपवादों को छोड़ दें तो लगभग ऐसा ही है क्योंकि दोस्ती में अनावश्यक अधिकार का भाव नहीं है , जबकि प्रेम का तात्पर्य ही एक दूसरे पर अधिकार है ।
जब अधिकार आता है तो अपेक्षाएं भी बढ़ जाती है । और तब इन अपेक्षाओं को निभाते रहने के लिए ये आवश्यक हो जाता है कि सब न कहा जाए ।
(कृष्णा थोडा रुके और मुस्कुरा कर बोले )
जानते हो जितना खुल कर तुमसे बात कर पाता हूँ उतना राधा या रुक्मिणी से भी नहीं कर सकता कभी । अब उन्हें सब बात बताऊ न, तो शायद मेरा आधे से ज्यादा समय रुठने मनाने में ही निकल जायेगा पार्थ ।
अर्जुन : (ठहाका लगाकर हंसे) समझ गया प्रभु , दोस्ती और प्रेम में शायद बस अपेक्षाओं का अंतर है । दोस्ती निस्वार्थ भाव है ,प्रेम में अधिकार एवं गहरी अपेक्षाओं का स्वार्थ है ।
कृष्णा : हम्म , समझदार होते जा रहे हो पार्थ ।
चलो अब घर चलो वरना सुभद्रा को जबाब देते रहोगे कि कहाँ इतना समय लगा दिया ।
(दोनों हँसते हुए घर की ओर बढ़ गए )

आधुनिक कृष्णा अर्जुन संवाद : 3

आधुनिक कृष्णा अर्जुन संवाद : 3
(कृष्णा और अर्जुन सुबह बाग में टहल रहे थे)
अर्जुन : कृष्णा ! कल आपने एक बात कही थी क़ि शादी के बाद अक्सर प्रेम में वो रंगत नहीं रहती , इसका क्या तात्पर्य है प्रभु ?
कृष्णा : ( गंभीर मुद्रा में ) हम्म ! वास्तव में ये बहुत हद तक सही प्रतीत होता है, अर्जुन । अब देखो न , प्रेम तो मैंने रुक्मिणी से भी किया ही है ,मगर तब भी तुम सब मेरे उस प्रेम को उतना कहाँ मानते हो ।
अर्जुन : हो सकता हे माधव , किन्तु इससे मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं मिला ?
कृष्णा : तो सुनो पार्थ , प्रेम स्वाभाविक है जबकि विवाह अस्वभाविक , प्रेम आत्मिक है जबकि विवाह सामाजिक ।
अर्जुन : पूरी तरह स्पष्ट कीजिये प्रभु , अभी भी बहुत समझ नहीं पाया हूँ ।
कृष्णा : ( मुस्कराहट के साथ ) अर्जुन , प्रेम का चुनाव हम स्वयं करते है किन्तु प्रेम में भी विवाह हम सिर्फ इसलिए करते है क्योंकि वो समाज की थोपी हुयी व्यवस्था है । प्रेम आत्मा से किया जाता है जबकि विवाह तो मात्र सामजिक जरुरत है न पार्थ ।
अर्जुन : किन्तु इससे प्रेम में कमी कैसे आ जायेगी प्रभु ?
कृष्णा : हमेशा तो नहीं अर्जुन , किन्तु कई विवाह समाज की तमाम जिम्मेवारियों और कर्तव्यों के पीछे खो से जाते है और उनमें वह प्रेम नहीं रह जाता जो विवाह से पहले हुआ करता था ।
(कृष्णा विचारमग्न से हो गए थे )
एक बात कहूँ अर्जुन , हर प्रेम को विवाह तक लाना बिलकुल भी आवश्यक नहीं , कुछ प्रेम सिर्फ प्रेम तक ही रहे तो वो ताउम्र प्रेम की सुगंध से महकते रहते है ।
अर्जुन : मैं तो थोडा और उलझ गया आपके इस अंतिम वाक्य से ।
कृष्णा : जानता था कि उलझ जाओगे , क्योंकि ये बात इतनी आसान नहीं है समझना । ज़िन्दगी कई बार ये बात खुद समझाती है । खैर चलो बाकी बात बाद में करेंगे , सुभद्रा ने आज नाश्ते में क्या बनाया है ?
अर्जुन : ये तो जाके ही मालूम होगा , वैसे मेरी तो भूख सी ही उड़ गयी है ।
(कृष्णा ने जोर से एक ठहाका लगाया )

आधुनिक कृष्णा अर्जुन संवाद : 2

आधुनिक कृष्णा अर्जुन संवाद : 2
अर्जुन : क्या कर रहे हो प्रभु ?
कृष्णा : कुछ नहीं पार्थ , बस फेसबुक पर पिछले संवाद को कितनो ने लाइक किया है, वही देख रहा था ।
अर्जुन : आज फिर एक प्रश्न है प्रभु ।
कृष्णा : हाँ ,हाँ पूछों पूछो ।
अर्जुन : प्रभु वो प्रेम मुक्ति है ,ये तो समझ आ गया । किन्तु प्रेम होता तो जीवन में एक ही बार है न ?
कृष्णा : (कृष्णा अभी भी स्मार्टफोन की तरफ देखते हुए बोले) ये किसने कह दिया तुमसे ,अर्जुन ?
अर्जुन : प्रभु ,कल शाम को एक हिंदी फ़िल्म देख रहा था ,उसमें शाहरुख़ खान कह रहा था क़ि हम एक बार जीते है और एक ही बार प्यार करते है । बस इसीलिए पूछा आपसे क़ि प्रेम तो एक ही बार होता है न ?
कृष्णा : (अर्जुन की तरफ देखकर ) अनुज, एक तो तुम ये हिंदी फिल्मो से फिलोसोफी मत पढ़ा करो , और एक बात बताओ प्रेम यदि वाकई एक बार ही होता तो सोचो मैं इतने लोगो से प्रेम कर पाता ? मुझे तो राधा , हर गोपी और अपनी सभी पत्नियो तक से प्रेम था न ?
अर्जुन : मगर प्रभु तब भी आप सच्चा प्रेम तो राधा से ही करते थे , ये तो सच ही है न । तब आपने प्रेम तो एक बार ही किया न ?
कृष्णा : एक तो तुम मनुष्य प्रेम में भी सच्चा और झूठा निकाल लेते हो , अरे प्रेम तो प्रेम ही होता है पार्थ ,उसमें सच्चे झूठे का कैसा प्रश्न (कृष्णा की आवाज थोड़ी तेज हो गयी थी ) और हाँ राधा मेरा पहला प्रेम थीं इसलिए शायद शास्त्रो ने उसे ज्यादा महत्व दिया है और शायद इसलिए भी क़ि वो प्यार , प्यार ही रह गया और शादी में नहीं बदला ।
(थोडा रुककर बोले ) वैसे भी जो प्रेम शादी में बदल जाए, वो प्रेम फिर न जाने क्यूँ उतना गाढ़ा नहीं रहता ।
अर्जुन : ऐसा क्यों प्रभु ?
कृष्णा : इस पर फिर कभी बात करेंगे ,आज के लिए एक ही प्रश्न । अभी के लिए याद रखो क़ि प्रेम जीवन में कई बार हो सकता है , यहाँ तक क़ि एक ही समय में कई लोगो से भी हो सकता है , और इसमें नैतिकता का पेंच मत घुसेड़ देना क्योंकि ये नैतिकता का विषय है ही नहीं पार्थ, ये तो पूर्ण मनोविज्ञान का विषय है ।
अर्जुन : कुछ कुछ समझ तो रहा हूँ प्रभु , समझ रहा हूँ क़ि प्रेम उतना सीधा विषय नहीं जितना कुछ किताबों और फिल्मो में दिखाते है ।
(कृष्णा फिर से फेसबुक में लग गए )

आधुनिक कृष्णा-अर्जुन सम्वाद :

आधुनिक कृष्णा-अर्जुन सम्वाद :
अर्जुन: प्रभु लोग लव मैरिज करके भी अलग क्यों हो जाते है ?
कृष्णा : क्योंकि प्रेम मुक्त करना सिखाता है ।
अर्जुन : मतलब, तो क्या एक दूसरे को छोड़ने को प्यार किया था ?
कृष्णा : नहीं ऐसा नहीं है पार्थ , जब तक उनमें प्यार रहता है वो दुनिया की भी नहीं सोचते , लेकिन सोचो पार्थ अगर रिश्ते में प्रेम ही ख़त्म हो जाए तो उस रिश्ते को आगे खींचना क्या बंधन नहीं है ? बस इसीलिए कहा क़ि प्रेम मुक्त होना सिखाता है ।
अर्जुन : तब माधव ये अरेन्ज मैरिज वाले इतनी आसानी से अलग क्यों नहीं होते ?
कृष्णा : (चेहरे पर तीखी मुस्कान के साथ ) हे अनुज, जिसने प्रेम ही न किया हो वह मुक्त करना क्या जानेगा ? वो तो स्वयं समाज के द्वारा बांधे गए होते है । और फिर जब वो एक होने की हिम्मत न कर पाये तो अलग होने की कैसे करते पार्थ ।
अर्जुन : धन्य प्रभु , धन्य , मैं समझ गया प्रेम सिर्फ एक राह नहीं है ,उसमे दोनों ओर के रास्ते है । बाँधने के भी और मुक्त करने के भी ।
(कृष्णा के चेहरे की मुस्कान तीव्र हो गयी थी )

सुकूँ

मैं सुकूँ में हूँ क्योंकि
मैं नहीं जन्मा सीमाओं के पास ,
मैं सुकूँ में हूँ क्योंकि
सीरिया ,मध्य एशिया बहुत दूर हैं मुझसे ,
मैं सुकूँ में हूँ क्योंकि
भारत के जंगलों का आदिवासी नहीं हूँ ,
मैं सुकूँ में हूँ क्योंकि
कश्मीर ,पूर्वोत्तर मेरे लिए टूरिस्ट स्पॉट हे बस ,
मैं सुकूँ में हूँ क्योंकि
मैंने युद्ध को सिर्फ किताबों में पढ़ा है ,
मैं सुकूँ में हूँ क्योंकि
अभी तक चिंगारियां मेरे घर तक नहीं आयीं हैं ,
मैं सुकूँ में हूँ क्योंकि
मैंने बंद कर रखी है अपनी शुतुरमुर्गी आँखें ,
मैं सुकूँ में हूँ क्योंकि
मुझे सुकूँ का ढोंग करना आ गया है ।

फेसबुकी क्रांति

क्रांति मांगती है
कोयले सी सुलगाहट,
ज़ो धधकती रहती है
भीतर सीने में कहीं चुपचाप ,
क्रांति की तैयारी में
हाथ होता है लंबी चुप्पी का,
वो नतीजा होती है
गहरे मनन और चिंतन का,
महज़ आवेग नहीं
नतीजा है लंबी तैयारियों का,
किन्तु अब क्रांतियां हैं ठन्डे बस्तों में
क्योंकि सीने की चिंगारियां
बुझा दी जाती है अक्सर
फेस बुक की चंद पंक्तियों में ।

Monday, 27 June 2016

ज़िन्दगीमय कविता

कविता जो लिखी थी कभी ,
तुक और धुन को ध्यान रखकर,
अब लयहीन हो चुकी हे ,
एकदम ज़िन्दगी की तरह ...

तुकबंदी हे आसान ,
कुछ शब्दों का चयन भर हे मात्र,
किन्तु भाव आते हे ,
कहीं गहरे से अक्सर बिना किसी
लय और तुक के ,
और रच देते हे एक लयहीन कविता ,
जो छोड़ती हे गहरे प्रभाव
एकदम ज़िन्दगी की तरह ....

Wednesday, 20 April 2016

वायदा

जानता हूँ क़ि
अब चाहे जैसा भी हो जाऊं,
परखोगे मुझे तुम सदा
मेरी उस एक गलती से,

मेरे हर कहे और किये को
तोलोगे , उस एक वाकये से तुम,
पाल चुके हो एक पूर्वाग्रह ,
अब मेरे लिए निष्पक्ष नहीं हो तुम

मैं अब बुरा करू या अच्छा ,
हर बार तुम्हे याद रहेगा ,
बस मेरा वह अपराध ,
क्योंकि मेरा निर्णय तुम कर चुके हो

मगर तुमसे एक वादा हे मेरा ,
कल गर तुमसे होगा कुछ गलत ,
तब मैं सिर्फ उसके बलबूते नहीं तोलूँगा तुम्हे ,
क्योंकि जानता हूँ ,
होता हे कितना भयानक ,
किसी की नजर में सदा को निर्णित हो जाना ।

Tuesday, 29 December 2015

तमाशा का साहित्य

तमाशा : बड़ी अलग सी मगर मानो साहित्यिक किताब जैसी फ़िल्म हे । ताज्जुब होता हे कि घोर व्यावसायिकता वाले माहौल में कोई हे जो लीड एक्टर्स के साथ पैरलल सिनेमा में नए प्रयोग कर रहा हे । इम्तियाज़ को सल्यूट हे उनके साहस के लिए ।
    वास्तव में ये साहस वही साहस हे जो किरदार वेद अंत में प्राप्त करता हे । कई बार लगता हे इम्तियाज़ खुद का भोगा हुआ यथार्थ दिखाते हे और इसी वजह से उनकी फिल्में साहित्यिक गहराई वाली प्रतीत होती हे ।
     ये फ़िल्म मिक्स रिव्यु लेके आई थी ।।कुछ को बहुत अच्छी तो कुछ को बेहद ख़राब लगी । फ़िल्म देखकर ये समझ भी आ गया क़ि ऐसा क्यूं रहा । वे लोग जो खुद दो ज़िन्दगी जी रहे हे और जिनके सपने आम लोगो से अलग रहे होंगे उन्हें जरूर ये अपनी कहानी लगी होगी , वेद का वह चिड़चिड़ापन उन्हें खुद का चिडचिडापन लगा होगा ।
  फ़िल्म के नजरिये से इस फ़िल्म पर कुछ कहना बेकार लगता हे क्योंकि ये आम फ़िल्म हे ही नहीं ये तो वह कहानी हे जो उस दर्शन की व्याख्या करती हे जिसमे अक्सर ही हम अपने बचपन को मारकर खुद को लगातार बड़े हो जाने का अहसास कराते हे और इस सब में हम खुद से कही दूर बहुत दूर निकल जाते हे । और एक दिन हम वह रहते ही नहीं जो क़ि हमें होना चाहिए था ।
   ये समस्या वैसे हर किसी के साथ हे ,बस अंतर कम या ज्यादा का हे ।।और इसी कारन ये फ़िल्म भी कम या ज्यादा अच्छी लगती हे ।।
  मगर इम्तियाज़ तुम वाकई इस बाजार की दुनिया में सच्ची संवेदना से भरे कलाकार हो जो खुद को लगातार ख़ोज रहा हे ।।।।

Saturday, 28 November 2015

कटाक्ष :कालिदास तुम्हारी हत्या जरुरी थी

कटाक्ष :कालिदास तुम्हारी हत्या जरुरी थी 

आज के समय में जब हर जगह सहिष्णुता और असहिष्णुता की एक बहस सी छिड़ी हे तब मुझे लगता हे कि इसका जबाब इतिहास में ढूँढना बहुत जरुरी हे .. सबसे बड़ा सवाल तो ये हे कि आज के लेखकों और बुद्धिजीवियों में इतनी हिम्मत ही कहाँ से आ गयी हे कि वो बिना सोचे समझे हमारी संस्कृति और धर्म का उपहास उड़ा देते हे ...कलबुर्गी जैसे नास्तिकों और पेरूमल मुरगन जैसे लोगों को कम से कम इतनी समझ तो होनी ही चाहिए कि ये भारत हे जहाँ संस्कृति पर सवाल नहीं झेला जायेगा ...मगर तब भी इतनी हिमाकत ? आखिर क्यूँ और कैसे ?

बहुत सोचा तब एक ही जबाब आया कि शायद प्राचीन लोग हद से ज्यादा सहनशील थे , कुछ ज्यादा ही ...वरना कालिदास आखिर जिंदा कैसे रह गए ? जिस कालिदास ने 'कुमार संभव' जैसा बेहद अश्लील साहित्य लिखा और वह भी भगवान् शिव को विषय बनाते हुए ,उस कालिदास को उस समय के लोगो ने न तो जान से मारा और उल्टा उसे महानता के शिखर पर बैठा दिया ...हालाँकि सुना हे  इसके लिए उनकी तब भी  आलोचना कि गयी थी मगर तब भी मात्र आलोचना से क्या होता ...उल्टा उन्हें उनकी अन्य रचनाओ के कारन महान लेखक साबित कर दिया गया ...कमाल तो ये हे कि ये बेहद अश्लील साहित्य कई यूनिवर्सिटी में पोस्ट ग्रेजुएशन में पढाया भी जाता हे ...मेरे हिसाब से आज के समय में इन नए लेखकों को देश में असहिष्णुता बढाने  से रोकने के लिए कालिदास तुम्हरी हत्या जरुरी थी ...

उस समय कि पीढ़ी की इस सहनशीलता ने आज के दौर में सहनशीलता के रक्षकों के सामने बड़े ही असहनशील प्रश्न खड़े कर दिए हे ...बे बेचारे जितना इन लेखकों को रोक रहे हे उतना ही कालिदास जैसे लेखको  की  घोषित महानता इनको प्रेरित करती हे कि वह हमारी पवित्र संस्कृति पर सवाल उठाये ...काश कि तुम्हे तब मार दिया होता तो ये सब आज इतने मुखर न हो पाते ..काश कि तुम आज ये सब लिखते तो तुम कालिदास नहीं कलबुर्गी बना दिए जाते ...सच में कालिदास तुम्हारी हत्या जरुरी थी ...

Sunday, 22 November 2015

कविता :चोट

कविता : चोट 


अधिक नहीं बस याद यही ,
कुछ हे कचोटता मुझे ,
क्या हे ये भी शायद जानता ,
मगर बताना भी बस ,
बढ़ाना होगा उस कचोट को ,
या शायद बह जाना होगा उसका .....


मगर सच हे कि ,
इस घोर असमंजस में ,
मैं खुद को तडपाना ,
सजा देना चाहता हू ...

कि शायद किसी तरह मेरी वह कचोट ,
मेरे मन पर बना दे ,
एक ऐसा निशां चोट का ,
कि याद रहे मुझे सदा ,
क्या था जो था कचोटता ,
क्यों था जो था कचोटता ....

नहीं मैं कोई  दार्शनिक नहीं ,
हु तो बस साधारण इंसान ,
जिसने भी की हे कई गलतियाँ,
सबकी तरह ,
जी रहा जैसे कुछ किया ही नहीं ....

इन गलतियों और चोटों का हिसाब नहीं रखा मैंने ,
मगर जब भी दी किसी और को चोट मैंने ,
तब बना लिया दिल पर खुद के
एक गहरा निशान चोट का ....

Saturday, 17 October 2015

कविता: जिज्ञासा

 जीवन में होने वाली गलतियों , उनसे उत्पन्न टूटन और उसकी सहज स्वीकारोक्ति को समर्पित कविता ....


चटकन के पड़े निशां,
छितराया मन का फलक
एक टूटन बिखरी पड़ी ,
अन्दर बहुत गहरे तलक ...

समझ सका जो न खुद को ,
खोज अर्थ भी न पाया  ,
मन के अन्दर जो झाँका ,
कुछ रौशनी कुछ अँधेरा पाया ...

उस अंधियारे रस्ते पर ,
चलने को बड़े कदम मेरे ,
वो पतन नहीं था मेरा ,
बस जिज्ञासा के थे घेरे ...

उस  जिज्ञासा के पूरन में ,
कुछ कलंक मेरे आये माथे ,
कुछ लगे दोष नए ,
कुछ मेरे असल थे साये ...

सही गलत को क्या चुनना ,
जब जिज्ञासा खुद हो रस्ता,
सही तो हे बस वही ,
जो हे पूर्व से ही स्थापित ,
जिज्ञासा के शमन में ,
सदा कलंक हे बसता ....

उस टूटन
उस चटकन ने ,
बहुत दूर मुझे ले आया हे
भटकाव मेरा कम हुआ या ज्यादा ,
कुछ समझ नहीं मन  पाया हे ....

बस हे तो एक जिज्ञासा ,
जिज्ञासाओं के सच को जानने की,
खुद के भटकाव को ,
नए सिरे तक ले जाने की ,
क्यूंकि ये भटकाव मेरा सच हे ,
ये जिज्ञासा मेरा जीवन हक़ हे ...

मैं बहूँगा समय कि धार  में पुनः ,
एक नयी जिज्ञासा फिर आएगी ,
टूटन का नया दौर चलेगा ,
जो पुनः गहरे तक बिखर जाएगी ....

Sunday, 12 July 2015

कहानी : समानता

मैं तुम पर अपनी इच्छाये नहीं थोपना चाहता मगर मैं ये भी नहीं चाहता कि तुम अब उस जगह काम करो "

"मगर मैं वहां काम करके बहुत खुश हूँ और वहां मेरी तरक्की के अवसर भी बहुत हे "

"वो ठीक हे मगर अब देखो तुम ये कॉर्पोरेट की जॉब छोड़ के किसी स्कूल में टीचर बन जाओ , उससे घर के लिए टाइम भी दे पाओगी "

"लेकिन टीचिंग ....."

"देखो मैं बस कह रहा हूँ ..."

"मगर मुझे मेरा काम बहुत पसंद हे ...."

"अरे काम तो सारे ही अच्छे होते हे , फिर औरतों के लिए तो टीचिंग बहुत ही अच्छा आप्शन हेना ..."

"होगा शायद ...मगर मुझे अपनी मार्केटिंग की जॉब में ही चेलेंज महसूस होता हे "

"यार क्या अब तुम मेरी इतनी भी नहीं मान सकती हो ..."

वो चुप थी अब ...सोच रही थी कि क्या इसे ही न थोपना कहते हे ....हाँ वो वाकई थोप नहीं रहा था बस घुमा फिरा के अपनी बात मनवाना चाहता था , या फिर इसे ही तो थोपना कहते हे ...

Wednesday, 8 July 2015

कुछ हो तुम

दर्द हो सीने में
गर छुपाना आये तो कुछ हो तुम,
आशू हो आँखों में,
गर उन्हें पीना जानो तो कुछ हो तुम....
यू रोना जो रोओगे
तो साथ तक छोड़ देगा जहाँ
जो पीठ में हो खंजर
गर तब भी मुश्काओ तो कुछ हो तुम
सच बस इतना हे
सलाम जीने वालों को करते हे लोग
सांस न भी हो हलक में
गर तब भी हो बुदबुदाहट तो कुछ हो तुम ...

Sunday, 5 July 2015

कहानी :अनुभव

कहानी : अनुभव

वो अलीगढ के दिन थे मेरे .. दूसरा साल था शायद कॉलेज का ..मगर वो दिन कुछ खास था . उस दिन अलीगढ में हमारी यूनिवर्सिटी का मेडिकल एंट्रेंस होने वाला था , जिस कारन उस दिन अलीगढ जंक्सन पर बहुत भीड़ रहती थी और उस भीड़ में होती थी खुबसूरत लड़कियां ...

तो आम लड़कों कि तरह हम भी उस खूबसूरती का दीदार करने उस रात स्टेशन गए थे ...मैं और मेरे तीन दोस्त (नाम लिख सकता हु मगर जरुरी नहीं समझता)..स्टेशन पर काफी देर टहलने और आँखों से खूबसूरती को निहार  लेने के बाद हम कमरे कि तरफ लौटने लगे थे ...और लौटते हुए वही स्टेशन के नुक्कड़ पर हलवाई  वाला दूध पिने के लिए रुके ...अभी रुके ही थे कि एक बुजुर्ग व्यक्ति हमारे पास आया और हमसे उसने पांच रुपये मांगे ताकि वह भी दूध पी सके ....जब हमने पूछा तो उसने बताया कि वह जौनपुर से आया था और यहाँ किसी ने उसके पैसे मार लिए हे जिस कारन वह सुबह से ऐसे ही घूम रहा हे और उसने कुछ खाया भी नही हे ....मेरे एक दोस्त ने उसे न सिर्फ दूध के पैसे दिए बल्कि हम सबसे कहा कि क्यूँ न इसे जौनपुर कि टिकेट  दिला दे ताकि ये घर जा  सके ...हम सबको ही ये विचार बहुत सही लगा था ...

खैर ये सोच कर हमने उसे लिंक एक्प्रेस का टिकेट दिला दिया था और उनसे कहा कि जब ट्रेन आये तो उसमे चढ़ जाना ...मगर एक नयी समस्या सामने आ गयी क्यूंकि वो बुजुर्ग पढना लिखना नहीं जानते थे और ऐसे में डर था कि वह कहीं गलत ट्रेन में न चढ़ जाएँ ...तब हम सबने सोचा कि क्यूंकि ट्रेन में अभी टाइम था तो क्यूँ न इन्हें कमरे पर ही ले चलते हे और जब ट्रेन का टाइम होगा तो खुद ही इन्हें बिठा भी देंगे ...

उस दिन उनकी मदद करने का अहसास हम चारों  को मन ही मन बहुत प्रसन्नता दे रहा था और इसी सोच में मेरे एक दोस्त ने कमरे पर आने के बाद अपना खाना तक उनको दे दिया ताकि वह रात के लम्बे सफ़र में भूखे न रहे ...आज हम चारों बहुत भावुक हुए जा रहे थे ...खैर तीन घंटे बाद रात के एक बजे ट्रेन का टाइम हो गया था और उन्हें स्टेशन छोड़ने के लिए मेरे दो दोस्त गए ...मैं आराम से आज तसल्ली से सो गया था ...एक भाव था कि कुछ अच्छा किया हे ...एक दिली तसल्ली थी ...

अभी आधा घंटा ही हुआ था कि मेरे दोस्त ने मुझे झंझोड़ के उठाया ..."अबे साले बाबा ठग था " ...ये सुनते ही मैं सन्न रहा गया था ...उसने बताया कि जब वो उसे छोड़ने गए तो ट्रेन और लेट हो गयी थी जिस कारन उन्होंने उसे वही एक पर्ची पर ट्रेन का नाम और प्लेटफार्म न. देकर छोड़ दिया था ...वो दोनों  वापिस आ ही रहे थे कि एक बेहद सुन्दर लड़की के कारन वो थोडा सा रुक गए थे ...तभी उन्होंने देखा कि वह बाबा टिकेट वापिसी काउंटर से टिकेट वापिस करके पैसे ले रहा था ....ये देखना था कि उन्होंने उसे पकड़ लिया ...वह घबरा कर उनके पैर पड़  गया ...उन्होंने पैसे वापिस छीन के उसे छोड़ तो दिया था  मगर उस घटना के साथ ही छुट गया था हम चारो का मदद करने का विश्वास..

इस घटना में हम चारो बेब्कुफ़ तो कहे जा सकते हे मगर सच में वह बेबकूफी हमारी इंसानियत से उपजी थी जिसको चकनाचूर करने में उस बूढ़े ने जरा भी हमदर्दी न दिखाई ...खैर ये एक कडुवा मगर सिखाने वाला अनुभव था हमारा...

Thursday, 2 July 2015

एक बेचलर की कथा : भाग 4

एक बैचलर की कथा : भाग ४

डिस्क्लेमर :- यह भाग बैचलर जीवन के अभिन्न हिस्से से सम्बंधित हे , अतः व्यंग्य से ज्यादा यदि श्रद्धा का भाव प्रदर्शित हो तो लेखक वाकई जिम्मेदार माना जाये |

बड़ी ही उतपाती परन्तु विशेष सहयोगी प्रजाति एक बैचलर के जीवन से जोंक की तरह चिपकी रहती हे | नहीं समझे क्या , तब जरा अपना मैरिटल स्टेटस चैक जरूर करे क्यूंकि या तो आप पीड़ित शादीशुदा व्यक्ति हे या फिर बैचलर की खाल में वान्ना बी (WANNA BE )शादीशुदा | उम्मीद हे कि विशुद्धः बैचलर समझ गया हे कि मैं मित्र समूह कि बात कर रहा हू| एक बैचलर का अपने मित्रो के बिना जीवन यापन मुश्किल ही नहीं नामुमकिन ही हे | पैसे उधारी या किताब उधारी , पार्टी मानना या लड़की पटवाना , किसी कि पिटाई या दुसरो कि बुराई , हर तरह के काम में जो आये काम , दोस्त होता हे उसी का नाम ( घटिया पद्यात्मक गद्या - तुकबंदी वाला , लेखक कि क्षमता के अनुसार ) |

आज के कलियुगी समाज के होशियार रिश्तेदार जब आपका फ़ोन आता देख ही, आपकी आर्थिक सहायता की मांग से पूर्व ही, अपने दुखड़े सुनाने शुरू कर देते हे तब ये मित्र स्वयं वास्तविक समस्याओं में जीते हुए भी ( याद रहे वह महीने के अंतिम सप्ताह में सिगरेट पीना बंद कर चुका हे ) अपने कमरे में बिखरे कपड़ो में से दस दस के नोट इकठे करके आपकी सहायता की जिजीविषा दिखाता हे , वाकई ये दृश्य स्वयं सुदामा रूपी मित्र द्वारा सुदामा की ही सहायता जैसा होता हे |

वहीँ दूसरी और अगर बात युद्ध क्षेत्र में सहायता की हो तब यही मित्र महाभारत के कर्ण से भी बड़ा कर्ण बन जाता हे और बिना ये सोचे समझे की हम धर्म की लड़ाई लड़ रहे हे या अधर्म की , ये सदा हमारा ही साथ देता हे |वाकई द्वापर के कर्ण से बड़े कर्णो ने तो कलियुग में जन्म लिया हे ( जय कल्कि महाराज ) | वहीँ कई ऐसे परम दीन काया (WEAK BODY ) वाले मित्र जो सामान्यतः कृष्ण रूपी नीतिवाचक (प्लनिंग समझाने वाले ) की भूमिका में रहते हे , समय आने पर शस्त्र भी उठा लेते हे ( हालाँकि तब ये निर्ममता से पिट के ही आते हे और जिस मित्र के लिए गए थे उसे समस्त जहाँ की गालिया भी देते हे , मगर इससे उनके मित्र धर्म पर संदेह नहीं किया जा सकता ) |

लड़कियों के मामले में प्रारंभिक प्रतितवन्दिता के सहयोग में बदलने का ज्वलंत उदाहरण भी ये मित्र ही हैं  | प्रारम्भ में समस्त पैतरें अपना लेने पे जब वह जान जाता हे की लड़की उसके मित्र को ही भाव देती हे तब ये तुरंत उसको भाभी के रूप में स्वीकार कर लेता हे | और तब सेटिंग से लेकर मीटिंग तक हर जगह ये मित्र ही काम आते हे | यहाँ तक कि यदि आपका ब्रेकअप हुआ तो ये मित्र ही आपकी पूर्व प्रेमिका के भावनात्मक सहारा बनते हे ( कई बार  परिणामस्वरूप आपकी पूर्व प्रेमिका आपकी ही भाभी बन जाती हे )

वाकई इस कलियुगी जीवन में जहाँ हर रिश्ता कमजोर पड़ा हे वहीँ दोस्ती मित्रता आज भी सतयुगी पायदान पर हे ( ये पंक्ति लेखक ने जानबूझ के डाली हे ताकि उसके दार्शनिक ज्ञान कि अभिव्यक्ति हो सके ) 

Wednesday, 24 June 2015

एक बेचलर की कथा : भाग 3

एक बेचलर की कथा : भाग 3

डिस्कलेमर - पिछले भाग में बेचलर की किचन में मैग्गी का बखान छूट जाने से इस भाग में मैग्गी से मेरा माफीनामा अर्ज हे

किसी ने सही कहा हे की बेचलर की किचन में अगर कुछ स्थायी हे तो वह मैग्गी हे मैग्गी हे । और तब भी मैं इसे भूल गया वाकई मेरी खता नाकबिले माफ़ी हे (हालानकी इसकी सजा कुछ बेचलर मुझे सार्वजनिक रुप से जालील करके दे चुके हे ) । अतः हे मैग्गी देवी मुझ तुच्छ से बेचलर को माफ़ करना क्योंकि तू ही मेरी वास्तविक पालानहार हे ।

ये एक ऐसा करिश्मा हे जो बना था शायद बच्चों के लिए मगर अपनी असीम सभवनओ के कारन बेचलर्स में ज्यादा प्रभाव जमा पाया । इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका आसानी और तेजी से बन जाने ने ,लाखो कामचोर एवं आलसी बेचलर्स को एक नयी जीवनरेखा दे दी हे । वास्तव में ईश्वर से कमतर नहीं ये ऐसे लोगो के लिए (सोच रहा हु की कभी मेग्गी पर भावपूर्ण आरती अवश्य लिखू तभी बेचलर्स के साथ वास्तविक न्याय होगा )।

मेग्गी वास्तव में चीन में बने नूडल्स का ब्रांड नाम हे मगर जैसे भारत में हर अलमीरा गोदरेज होती हे वैसे ही हर शीघ्र तैयार होने वाला नूडल्स मेग्गी कहलता हे । इस ब्रांडिंग में बेचलर्स का योगदान अविश्मरणीय हे । सुबह का नाश्ता हो या शाम के स्नैक्स या फिर उल्लूरुपी रात्रिचर बेचलर्स की उदरपूर्ति का साधन ,सभी भूमिकाओं में मेग्गी ऐसे समा गयी हे की बेचलर जीवन की कल्पना ही अधूरी हे । इसके उलझे और बेतरतीब नूडल्स स्वयं ही बेचलर की जिंदगी के समानार्थी प्रतिबिम्बक हे ।

जहाँ एक बेचलर मेग्गी के ढेर से घिरा हुआ हे वहीँ एक शादीशुदा के घर में यह उसी दिन बनती हे जब उसकी पतनी ने खाना बनाने से मना कर दिया हो । स्पष्ट हे कि वास्तविक मेग्गी प्रेमी एक बेचलर ही हे । यहाँ तक की वह दिन में तीन बार मेग्गी खाकर भी अगले दिन उसी चाव से इसका नाश्ता करता हे । वाकई ये उसके एकनिष्ठ प्रेम का ही प्रतीक हे ।

मेरे खयाल से मेग्गी के एड में बच्चों के बजाय बेचलर्स को दिखाया जाना चाहिए क्योंकि वे ही वास्तविक मार्किट हे मेग्गी के । अब अगर आगे से आपको मेग्गी के एड में बेचलर दिखाई दे तो उसमें मेरा ही योगदान माना जाये । (क्रमशः)

एक बेचलर की कथा : भाग 2

एक बैचलर की कथा : भाग 2

डिस्क्लेमर : यह व्यंग्य लगभग सभी बैचलर की जिंदगियों से प्रेरित हे, अतः प्रत्येक बैचलर इससे स्वयं को आहत ही माने ....

बैचलर की जिंदगी में दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा उनकी किचन का एक शादीशुदा की किचन से पूरी तरह भिन्न होना हे । शादीशुदाओ की किचन के विपरीत बैचलर की किचन कई बार चलायमान हो जाती हे । सुविधानुसार उसे कहीं भी उठाया और रखा जा सकता हे । मोड्यूलर किचन के जमाने में मोबाइल किचन की नवीन खोज बचेलोरों के अथक शोध का  ही परिणाम हे ।

इस किचन में जरुरत से ज्यादा एक भी सामान नहीं पाया जाता जैसे कुछ इक  थाली , 2 से 4 चम्मच एवं कुछ कप और अन्य छोटे बर्तन । भारतीय अर्थव्यवस्था के कम संसाधनों में बेहतर प्रबंधन के फॉर्मूले का ज्वलंत उदाहरण हे ये किचन । बर्तनों की भूमिका यहाँ स्थायी नहीं वल्कि आगंतुकों के हिसाब से बदलती रहती हे । कढ़ाही कई बार थाल के समान खाना खाने में प्रयोग हो जाती हे तो कई बार चमचे का प्रयोग चम्मच के तौर पर भी किया जाता हे। एक पोस्ट पर बैठे व्यक्ति से कई पोस्टों का काम कराने का कॉर्पोरेट प्रबंधन का सूत्र शायद इन्ही किचनो से प्रेरित हे ।

यहाँ पर मिठाई के डिब्बे , कोल्डड्रिंक की बोतलों का जैसा उत्तम प्रयोग देखने को मिलता हे यदि उसे अपना लिया जाए तो स्वच्छ भारत अभियान एक माह में ही पूरा हो जाये (अतिशयोक्ति अलंकार का उदहारण :ख़ास हिंदी के छात्रों हेतु ) । पुराने आधे टूटे कपों का संकलन आपातकालीन परिस्तिथि में चाय परोसने हेतु भी रखा जाता हे (डिजास्टर मैनेजमेंट )।

इस किचन के खाने की शान हे आलू ,चावल एवं दाल । जब जब भी बैचलर अपने महत्वपूर्ण आलस नामक गुण के कारन सब्जी नहीं ला पता तब तब वह आलू के परांठे , खिचड़ी या दाल बनाके काम चलता हे । और इस पर दम्भ ये कि वास्तव में वो ऐसा ज्यादा तड़क भड़क के खाने में विशवास न रखने के कारन करता हे और कई बार तो दोस्तों के सामने अपनी इस आदत को गांधीजी के दर्शन से जोड़कर कह देता हे क़ि वह जीने की लिए खाता हे नाकि खाने के लिए जीता हे ।
इस प्रकार एक बैचलर की किचन एक शादीशुदा की अतिव्यवस्थित किन्तु बोरिंग किचन को चिढ़ाती हुयी जीवन के बैचलर दर्शन को व्यक्त करती हे ।   (क्रमशः)

Tuesday, 23 June 2015

एक बेचलर की कथा

एक बैचलर की कथा :

आज कुछ ऐसा लिखने की कोशिश करूँगा जो की ज्यादातर लड़को की दास्ताँ रही हे । ये दासतां थोड़ी लंबी होगी, तो शायद कई भागों में ही लिखूं ।

आज शुरू करता हु एक बैचलर और घर से दूर रह रहे लड़के के कमरे की व्यथा से । सच कहूँ तो इनके कमरे की कथा नहीं व्यथा ही हुआ करती हे । वो क्या हे न कि शुरुआत में तो सारी वस्तुएं बड़ी सजा के रखी जाती हे मगर जैसे ही एक हफ्ता बीता , उन वस्तुओं को खुद नहीं पता होता कि वे आखिर हे कहाँ ? फिर कोई 6 महीने बाद ही इनको फिर से ठिकाने लगाया जाता हे और एक हफ्ते बाद फिर वही व्यथा । और उस पर दुःख ये कि कई चीज़े तो साल भर बाद ही किसी कोने या बिस्तर में दबी मिलती हे , इनमे से कई को लेकर तो दोस्तों पर इन्हें ग़ुम करने का इल्जाम भी लगाया जा चूका होता हे । खैर इसी वजह से इन खोयी हुयी वस्तुओं की कई सारी प्रतिलिपि आपको इस व्यथित कमरे में मिल जाएँगी ।

कमरे में प्रवेश करते ही स्वागत होता हे जूते चप्पलों के ढेर से , जो शुरुआत में ही रंग बिरंगी शक्लो से आने वालों को मुह चिड़ाते हे और कुछ तो उलटे मुह होकर आगंतुक को न घुसने की चेतावनी भी देते हुए लगते ह । पायदान भी होता तो हे मगर वो खुद ही टनो मिटटी के ढेर में दबा अपनी वास्तविक शकल को तरस रहा होता हे । और महीने के ज्यादातर दिनों में धूल की एक हलकी रेशमी परत सारे कमरे की आभा को बड़ा रही होती हे ।  ऐसा नहीं हे की बैचलर सफाई नहीं करता , मगर वो सफाई का वास्तविक आनंद लेने को कई कई दिन तक इस कार्यक्रम को स्थगित करता हे  ताकि जब कई दिन बाद सब साफ़ दिखे तो लगे की मानो यहीं जन्नत हे (कश्मीर टूर कमरे पर करने का आसान उपाय हे ये )।

अगर बैचलर पढ़ाई करता  हे तो कमरे का सबसे बड़ा आकर्षण हे एक मेज और कुर्सी । मगर इसका इस्तेमाल पड़ने में कम  साजो सामान रखने में ही ज्यादा होता हे । मेज तो मानो ड्रेसिंग टेबल,पूजाघर, किताबघर और ना जाने कितने मल्टी परपस कार्य करती हे तो कुर्सी पर तौलिये से लेकर गंदे कपडे तक सभी झूला झूलते रहते हे । हाँ ये अलग बात हे की जिस दिन पड़ना होता हे उस दिन ये  सारे सामान बिस्तर की भेट चढ़ा दिए जाते हे ।वास्तव में मेज कुर्सी के ये सब सामान कमरे के सबसे यूज़फुल मगर लावारिस सामान हे जिनक कोई एक ठिकाना नहीं हे । (क्रमशः)

डिस्क्लेमर : इस व्यथा को मेरी आदतों से जोड़ना या न जोड़ना आपके स्वविवेक पर निर्भर हे

व्यंग्य :मैं आहत हूँ

सुबह उठते ही बहुत आहत सा महसूस कर रहा था आज . समझ नही आ रहा था कि आख़िर हुआ क्या हे. ना पेट मे दर्द था नाही सिर मे , यहाँ तक की बुखार का भी नामोनिशान नही था .बहुत ज़ोर देने पर भी समझ नही आया की आख़िर आहत हूँ तो हूँ क्यों ?
    
    खैर इसी आहतपूर्ण अवस्था मे ही मैने अख़बार पलटना शुरू किया . लेकिन जैसे ही मुख्य पृष्‍ठ पर नज़र डाली ही थी कि  देखा की कुछ लोग किसी फिल्म के दिखाए कॉंटेंट से आहत थे तो वहीं कुछ लोग किसी कॉमेडी शो की रोस्टिंग से आहत थे .कुछ पेज और पलटते ही देखा एक धार्मिक समुदाय दूसरे समुदाय से गंभीर तौर पर आहत हे तो वही दूसरे समुदाय का कहना हे कि वह पहले से ही खुद इतने आहत हे की किसी को क्या आहत करेंगे.? इन्ही सबके बीच आगे बढ़ते ही पढ़ने को मिला की एक राजनीतिक पार्टी समय समय पर लगने वाली आर टि आई एवं केग की रिपोर्ट्स के कारण ढंग से करप्ट ना होने के कारण आहत हे . तो वहीं विकसित देश विकाशशील देशों के विकास से आहत नज़र आए . यहाँ तक की हमारा पड़ोसी देश क्रिकेट मेच मे बुरी तरह हारने से आहत था और उनका कहना हे कि अगर थोड़ा कम रन से हराया जाता तो शायद वह
आहत नही होते .
   
   इन सबके बीच मुझे लगने लगा की आज मैं अकेला आहत नही हू बल्कि सारे जहाँ मे आहत होने की होड़ मची हे . मगर इस झुटि तसल्ली मे मेरे सामने नया सवाल था कि आख़िर मैं क्यू आहत हू ? बहुत खोजने पर भी ऐसा कोई कट्टर भाव ना मिल पाया जिस के कारण मे आहत हुआ हू . तब मुझे लगा की शायद मैं इन सबके बात बात पर आहत होने से आहत हू , मगर फिर याद आया कि मैं कोई कबीर बुद्धा या गाँधी की श्रेणी का तो हू नही जो इस गंभीर मगर मेरे लिए तुच्छ बात से आहत हो जाता . तब अंत मे समझ आया कि मैं वास्तव मे इस आहत होने की दौर मे खुद के आहत ना हों पाने से ही इतना आहत था .